जीवन का कड़वा सच मृत्यु से डरना नहीं
॥ सत्यम् ॥
जीवनस्य अन्तिमं रहस्यम्
किं सत्यम्? (सत्य क्या है?)
इस अनित्य संसार में मनुष्य भ्रम में जी रहा है। हम जिसे अपना मानते हैं, वह क्षणिक है। इस पोस्ट के माध्यम से हम उस सत्य की चर्चा करेंगे जिसे जानकर बड़े-बड़े ऋषियों ने परम शांति प्राप्त की।
"अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः।
नित्यं संनिहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंग्रहः॥"
अर्थ: शरीर अनित्य है, धन-सम्पत्ति स्थायी नहीं है, मृत्यु सदा निकट खड़ी है, इसलिए केवल धर्म का संग्रह करें।
क्या आपको भय लगता है?
मृत्यु का भय उसी को होता है जिसने जीवन को केवल बाहरी सुखों में तलाशा है। जिसने अपने भीतर के 'आत्म-तत्त्व' को पहचान लिया, उसके लिए मृत्यु केवल एक द्वार है, अंत नहीं।
कर्मणः गतिः (कर्म की गति)
मनुष्य जैसा बीज बोता है, वैसा ही फल पाता है। हमारे आज के संकट हमारे ही पूर्व कर्मों का परिणाम हैं। परन्तु, 'पुरुषार्थ' के द्वारा हम अपने भाग्य की रेखाओं को बदल सकते हैं।
यदि आप निःस्वार्थ भाव से समाज और धर्म की सेवा करते हैं, तो ईश्वर स्वयं आपके सारथी बन जाते हैं।
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥"
॥ उपसंहार ॥
संसार एक स्वप्न के समान है। जागिए! सत्य को पहचानिए। धर्म का मार्ग ही कल्याण का मार्ग है।
शुभम् अस्तु।